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उन्नाव के एआरटीओ दफ्तर में फर्जीवाड़े का ‘बम…

निष्कासित कर्मचारी के आरोपों से मचा हड़कंप..

स्वतंत्र हित/संवाददाता

उन्नाव। अगर एक निष्कासित कर्मचारी के आरोपों में जरा भी सच्चाई है तो उन्नाव का एआरटीओ कार्यालय केवल ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने का केंद्र नहीं, बल्कि ऐसा अड्डा साबित हो सकता है जहां नियम-कानूनों को दरकिनार कर सड़कों पर मौत दौड़ाने की तैयारी की जा रही थी। विभाग से बाहर किए गए डीईओ शिव सिंह ने ऐसे आरोप लगाए हैं, जिन्होंने परिवहन विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिव सिंह का दावा है कि जनवरी 2026 से जून 2026 तक जारी किए गए तमाम व्यावसायिक ड्राइविंग लाइसेंसों में लगाए गए मेडिकल प्रमाणपत्रों की जांच करा ली जाए तो कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। उनका आरोप है कि बिना समुचित प्रशिक्षण और कथित फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्रों के आधार पर ड्राइविंग लाइसेंस जारी किए गए। सवाल यह है कि यदि चालक का स्वास्थ्य परीक्षण ही सही तरीके से नहीं हुआ और प्रशिक्षण भी कागजों में पूरा दिखा दिया गया तो आखिर सड़कों पर दौड़ रहे इन वाहनों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
पूर्व कर्मचारी ने एआरटीओ कार्यालय के कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि छह माह के रिकॉर्ड, मेडिकल प्रमाणपत्रों और लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया की बारीकी से जांच करा दी जाए तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।
मामले का दूसरा पहलू और भी गंभीर है। आरोप है कि जिन श्रेणियों के वाहनों के संचालन के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, उनसे जुड़े लाइसेंस भी नियमों के विपरीत जारी किए गए। यदि ऐसा हुआ है तो यह केवल विभागीय अनियमितता नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। हर दिन सड़क हादसों में जान गंवाने वाले लोगों के बीच यह सवाल स्वाभाविक है कि कहीं नियमों को ताक पर रखकर लाइसेंस जारी करने की कीमत आम नागरिक तो नहीं चुका रहे?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि विभाग के भीतर इतने बड़े स्तर पर कथित गड़बड़ियां हो रही थीं तो निगरानी व्यवस्था क्या कर रही थी? क्या वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी भनक नहीं थी या फिर शिकायतों को नजरअंदाज किया जाता रहा? यह भी जांच का विषय है कि आखिर आरोप लगाने वाला कर्मचारी अब सामने क्यों आया और उसके आरोपों का आधार क्या है।
मामले में संबंधित अधिकारियों का पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। समाचार संकलन के दौरान विभागीय अधिकारियों से संपर्क का प्रयास किया गया, लेकिन कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। ऐसे में आरोपों की पुष्टि स्वतंत्र जांच के बाद ही हो सकेगी।
फिलहाल उन्नाव का परिवहन विभाग सवालों के घेरे में है। अब देखना यह होगा कि शासन इन आरोपों को एक नाराज कर्मचारी की प्रतिक्रिया मानकर छोड़ देता है या फिर छह माह के रिकॉर्ड की परतें खोलकर सच सामने लाने का प्रयास करता है। क्योंकि यदि आरोप सही निकले तो यह मामला सिर्फ फर्जी मेडिकल प्रमाणपत्रों का नहीं, बल्कि व्यवस्था में बैठे उन चेहरों का होगा जिन्होंने नियमों से समझौता कर जनता की जान को जोखिम में डाला।

सवाल जो जवाब मांग रहे हैं

उन्नाव में वर्ष 2024 में दो ट्रेनिंग स्कूल बिना प्रशिक्षण में मानक से कई गुना अवैध तरह से फर्जी सर्टिफिकेट काट कर फर्जी कॉमर्सियल ड्राइविंग बनाने का गोरखधंधा बड़े स्तर पर संचालित था जिसके बाद ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के आदेश पर जाँच के दौरान दोषी पाए जाने पर उन्नाव मोटर ड्राइविंग ट्रेंनिग स्कूल -फरीद अहमद और न्यू वाशू मोटर ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल डीह निवासी वाशू उर्फ प्रशांत द्विवेदी के ट्रेनिंग स्कूल के लाइसेंस निरस्त किये जा चुके।

वही निरस्तीकरण के बाद भी विभागीय अधिकारियों ने मोटी रकम लेकर महज कुछ दिनों में ही दोषी फरीद अहमद अपने भाई के नाम हाईटेक मोटर ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल खुलवा दिया वही वाशू प्रशांत द्विवेदी ने भी अपने भाई डीह निवासी विनीत द्विवेदी के नाम ब्योम मोटर ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल खुलवा दिए हालांकि इन स्कूलों का संचालन कोई और यही बल्कि फर्जीवाड़ा कांड करने वाले दोषियों ने अपने भाइयों के नाम ट्रेनिग स्कूल खुलवा कर उनकी कमान खुद संभाल रखी है जिसके बाद एक बार फिर जनवरी 2026 में जून 2026 तक ट्रेनिंग स्कूलों के सर्टिफिकेट में बड़े पैमाने पर फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट लगाए गए और इन अवैध कार्यों को अंजाम देने एआरटीओ स्वेता वर्मा और अमिता तिवारी, सुभम देव दिवारी शामिल सहित तमाम अधिकारी शामिल है

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