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कानपुर में ‘न्याय बंद, अत्याचार चालू’…?

मानवाधिकार लड़ाई को नई धार, “वर्ल्ड एक्रेडिटेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स” के तहत डॉ. तारिक ज़की की पहल सुर्खियों में

दहेज, दुष्कर्म प्रयास जैसे गंभीर आरोपों में FIR नहीं — पीड़िता पहुंची मानवाधिकार आयोग, सिस्टम पर उठे बड़े सवाल

कानपुर/ उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न केवल महिला सुरक्षा बल्कि कानून-व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक विवाहित महिला द्वारा दहेज उत्पीड़न, मारपीट, छेड़छाड़ और दुष्कर्म के प्रयास जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं, लेकिन आरोप है कि इतने गंभीर प्रकरण के बावजूद अब तक प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई।

इसी बीच “वर्ल्ड एक्रेडिटेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स” पहल के तहत मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. तारिक ज़की की सक्रिय भूमिका ने इस मामले को नई दिशा दे दी है, जिससे प्रशासनिक तंत्र पर जवाबदेही का दबाव बढ़ता नजर आ रहा है।

पीड़िता पायल सोनी के अनुसार:

– ₹4 लाख की दहेज मांग को लेकर लगातार प्रताड़ना
– देवर द्वारा कथित अश्लील हरकतें एवं दुष्कर्म का प्रयास
– विरोध करने पर मारपीट एवं जान से मारने की धमकी
– घर से जबरन निकालना
– स्त्रीधन (जेवर आदि) पर अवैध कब्जा

फरवरी 2026 में कथित रूप से गंभीर मारपीट के बाद पीड़िता को घर से बाहर कर दिया गया।

पीड़िता द्वारा 16 मार्च 2026 को थाना स्तर से लेकर उच्च अधिकारियों तक शिकायत दी गई, जिसकी पुष्टि IGRS पोर्टल पर दर्ज शिकायत संख्या 40016426021860 से होती है।

आरोप है कि:

– शिकायत को मात्र “फॉरवर्ड” कर दिया गया
– अब तक FIR दर्ज नहीं की गई
– कोई प्रभावी जांच प्रारंभ नहीं हुई

यह स्थिति पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

न्याय न मिलने पर पीड़िता ने उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई, जो डायरी संख्या 2487/IN/2026 के तहत पंजीकृत है।

हालांकि, समाचार लिखे जाने तक आयोग स्तर पर भी कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है।

“वर्ल्ड एक्रेडिटेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स” अभियान के तहत डॉ. तारिक ज़की द्वारा इस मामले को मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में उठाया गया है।

सूत्रों के अनुसार, उनके प्रयासों से न केवल पीड़िता को कानूनी मार्गदर्शन मिला है, बल्कि प्रशासनिक स्तर पर भी जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया तेज हुई है।

डॉ. ज़की का कहना है:

«“मानवाधिकार केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। हर पीड़ित को समय पर न्याय मिलना ही असली लक्ष्य है, और इसके लिए हर स्तर पर संघर्ष आवश्यक है।”»

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार के गंभीर संज्ञेय अपराधों में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के तहत FIR दर्ज करना अनिवार्य है।
ऐसे में FIR दर्ज न होना, न्याय प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है।

सूत्रों के मुताबिक, पीड़िता अब न्यायालय का रुख करने की तैयारी में है, जहां से FIR दर्ज कराने की मांग की जाएगी।
यदि अदालत हस्तक्षेप करती है, तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।

बड़े सवाल..?

क्या उत्तर प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित है?
क्या गंभीर आरोपों में भी FIR दर्ज कराना इतना कठिन हो गया है?
जिम्मेदार कौन — आरोपी या सिस्टम?
यह मामला न केवल एक पीड़िता की न्याय की लड़ाई है, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही की परीक्षा भी है।
“वर्ल्ड एक्रेडिटेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स” के तहत डॉ. तारिक ज़की की सक्रियता ने यह संकेत दिया है कि यदि संगठित प्रयास किए जाएं, तो दबे हुए मामलों को भी न्याय की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है।

(नोट: यह समाचार पीड़िता द्वारा लगाए गए आरोपों एवं उपलब्ध दस्तावेजों पर आधारित है। मामले की पुष्टि एवं जांच संबंधित एजेंसियों द्वारा की जानी शेष है।)

पीड़िता ने बताया

3 महीने से इंस्पेक्टर बाबूपुरवा चौकी इंचार्ज बगाही चौकी इंचार्ज पिंक चौकी  किदवई नगर सिर्फ दौडा रहे हैं मेरी कोई सुनवाई नहीं हो रही है मुझे चौकी थाने वालों ने मजाक बना रखा है अब मैं न्याये के लिए  कहां जाऊं योगी जी के राज में पुलिस बहरी हो गई है

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