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पत्रकारिता के भीष्म पितामह की धरोहर वीरान, शासन-प्रशासन की बेरुख़ी से खंडहर में बदलती इमारत

जहाँ से निकलता था क्रांति का इतिहास लिखने वाला प्रताप,

पंकज दुबे

स्वतंत्र हित

कानपुर—गणेश शंकर विद्यार्थी, जिन्हें पत्रकारिता का भीष्म पितामह कहा जाता है, उनकी वही ऐतिहासिक इमारत आज जर्जर और वीरान खड़ी है। यह वही जगह है जहाँ से प्रताप अख़बार निकलता था और देश की आज़ादी की लड़ाई में कलम को हथियार बनाया गया था।

क्रांतिकारियों की शरणस्थली

यही वह जगह रही है जहाँ भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारी बैठकर लेख लिखते थे। गांधीजी तक इस इमारत में ठहरे थे। यह महज़ एक भवन नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम और पत्रकारिता का धड़कता हुआ दिल था।

मरम्मत के नाम पर लूट, नतीजा—खंडहर

आज इस धरोहर की हालत ऐसी है कि कई बार मरम्मत और संरक्षण के नाम पर बजट पास हुआ, लेकिन नतीजा शून्य निकला। इमारत की छतें झड़ रही हैं, दीवारों पर दरारें हैं और पूरा ढांचा धीरे-धीरे मिट्टी में मिल रहा है।

जूते पॉलिश करके जताया आक्रोश

इतिहास की इस उपेक्षा के खिलाफ *लेखक मृदुल कपिल पांडे और पत्रकार अतुल तिवारी आक्रोश* ने गंगा मेला में जूते पॉलिश कर आक्रोश जताया। उनका मकसद था जनता और सरकार को याद दिलाना कि अगर यह धरोहर बचाई नहीं गई तो आने वाली पीढ़ियों के सामने हम शर्मसार होंगे।

प्रशासन और शासन पर सवाल

इतिहास की इतनी बड़ी धरोहर खंडहर में तब्दील हो रही है, लेकिन कानपुर प्रशासन और उत्तर प्रदेश शासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। सवाल यह उठता है कि क्या हमारे नायक सिर्फ भाषणों और किताबों तक ही सीमित रहेंगे?

क्या विरासत मिट्टी में मिल जाएगी?

गणेश शंकर विद्यार्थी की यह इमारत सिर्फ एक भवन नहीं बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम, पत्रकारिता और क्रांतिकारी विचारों की आत्मा है।
अगर इसे बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियाँ यही पूछेंगी—क्या हम अपने इतिहास और विरासत के गुनहगार नहीं?

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