पंकज दुबे
स्वतंत्र हित
कानपुर। शहर डेंगू की चपेट में है — अस्पतालों के बाहर लंबी कतारें हैं, वार्डों में बेड फुल हैं, प्लेटलेट्स गिरने से मरीज बेहाल हैं और दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग और नगर निगम चैन की नींद सो रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे अधिकारियों के लिए डेंगू अब “मौसमी त्योहार” बन गया हो — हर साल आता है, हर साल जाता है, और हर साल सिस्टम नाकाम साबित होता है।
एडीज मच्छरों ने पूरे शहर में दहशत फैला दी है। अब तक 13 लोगों में डेंगू की पुष्टि हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग तेज बुखार और शरीर दर्द की शिकायत लेकर अस्पतालों में इलाज को तरस रहे हैं। लेकिन अफसरों के ऑफिस में न रिपोर्टिंग की चिंता है, न रियल ग्राउंड वर्क का अंदाज़ा।
सफाई व्यवस्था की हालत यह है कि गलियों और नालों में गंदगी से लबालब पानी भरा है, मच्छरों के लार्वा खुलेआम पनप रहे हैं। नगर निगम का फॉगिंग अभियान सिर्फ अखबारों और ट्वीट्स तक सीमित है। हकीकत में न दवा छिड़काव हुआ, न कोई लार्वा सर्वे। मोहल्लों के लोग कहते हैं — “अफसर सिर्फ फोटो खिंचवाने आते हैं, सफाई करने नहीं।”
बरसात के बाद संक्रमण नियंत्रण की जगह शहर में संक्रमण का विस्फोट हो गया है। जिला अस्पताल से लेकर प्राइवेट क्लीनिक तक भीड़ है, लोग प्लेटलेट्स के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर अगले दस दिनों में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो डेंगू के केस तीन से चार गुना तक बढ़ सकते हैं — यानी शहर में महामारी का विस्फोट तय है।
नगर निगम के अफसर आखिर क्या कर रहे हैं?
संचारी अभियान का पैसा कहां गया?
और हर साल एक ही बीमारी से शहर क्यों तबाह होता है?


